शून्य में देखना..
ये शब्द मुझे काफ़ी प्रशिद्ध दार्शनिक Nietzsche के एक कथन की याद दिलाते है:
“Battle not with monsters, lest ye become a monster, and if you gaze into the abyss, the abyss gazes also into you.”
हालाकि यहाँ पर शून्य की बात नहीं अंधकार की बात हो रही है. लेकिन क्या शून्य और अंधकार एक जैसे नहीं है? अंधकार प्रकाश की कमी है और शून्य एहसास की कमी ।
मुझे दर्शन शास्त्र के बारे में इतना तो नहीं पता, लेकिन इतना तो पता है कि शून्य का एहसास काफ़ी शांत और संतोषजनक होता है। कुछ ना महसूस कर पाना भी एक एहसास है । शून्य की कोई परिभाषा तो नहीं, ना ही कोई अकार है । बस जब आपका शरीर और मस्तिष्क को एक ऐसी शांति का अनुभव हो जो कुछ ना करने से मिल रही हो, जो बिलकुल स्थिर हो।
हालाकि शून्य काफ़ी संतोषजनक होता लेकिन यह अनुभव की प्राप्ति की लत जब किसी को लग जाती तो वह इंसान शून्य में ही शांति और सुख पाने लगता है, हमे समझना चाहिए कि शून्य एक अनुभूति विहीन आयाम है और उस आयाम में ही सुख पाना एक paradox से कम नहीं ।
Nietzsche के कथन और ऊपर लिखित अनुछेद पर वापस ध्यान देने पर शून्य और अंधकार का संबंध और गहरा होता है । शून्य और अंधकार दोनों में ज़्यादा समय व्यतीत करने से वह हमे अपने जैसा बना देते हैं। अंधकार हमें विवेकहीन और क्रूर बनाता है, वहीं शून्य हमें संवेदनहीन और खोखला बना देता है।
(शून्य शब्द का उपयोग यहाँ "void" के लिए हुआ है)
~ Necromancer